कुछ लम्हे वक़्त के

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Photo credit : clicked by me in Pune

वक़्त के झरोखे से झाँक कर जब कल को देखती हूँ तो सब कुछ बहुत तीव्र सा निकलता दिखता है। मन करता है कि रोककर पूछ लू तुमसे कि तुमने मुझे तब कुछ क्यों नहीं समझाया, जब तुम मेरे पास असीम रूप में थे।

अर्चिता, ऐसा नहीं है कि मैंने तुम्हें समझाया नहीं, मैंने तुम्हें बहुत समझाया, हर पल, हर लम्हा।।
पर तुम अपनी ही दुनिया में मस्त रहती थी। सुनती कहा थी,जब मैं तुमसे कुछ कहता था। बस अपनी ही धुन में सवार रहती थीं।मैं कई बार तुम्हारे पास आया, ये सोचकर कि आज तुमसे बात करके मैं तुम्हें कुछ समझा पाऊँ, पर कभी तुम नृत्य में व्यस्त रहती थी तो कभी अपनी छत पर संगीत सुनने में व्यस्त रहती थीं तो कभी अपनी मस्ती में । मस्ती भी तुम पर ऐसे ही सवार नहीं होती थी । वो तुम्हारे दिमाग़ में घुसकर इस तरह रहती थी जैसे तुम्हारा दिमाग़ ही उसका घर हो और वो उसकी मालकिन । शायद तुम्हारा भी पूरा दोष नहीं था, किंतु योगदान ज़रूर था।
मैं मानता हूँ तुम्हारे आसपास की दुनिया तुमसे बहुत अलग थी । तुम अपने सपनों की बात करती थी तो तुम्हारे आसपास कोई ऐसा नहीं था जो तुम्हें समझ सके। जो भी मिला तुम्हें हतोत्साहित करने वाला मिला। पर मैं हर पल तुम्हारे साथ था, तुम्हें बताने के लिए कि तुम सही हो और शायद इसलिए आज यहाँ हो। अनुभव तुम्हें मिलेंगे पग पग पर और तुम्हें तुम्हारी मंज़िल तक ले जाएँगे और मैं हमेशा तुम्हारे साथ था, हूँ और रहूँगा।
तुम्हारे साथ
तुम्हारा वक़्त

~Aadria Archana~

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